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शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

एक दीप नें कहा.....

युं तो दीपावली का त्यौहार चलागया
ओर फिर अगले साल आएगा
लेकिन
बुझाया हुआ एक दीप कहरहा है
कि

“तेरे धुएँ और शोर से घुटघुट कर
मरगयी गालिब !!!!
लोग भूले नहीं मुझे मेरे बदले
मोमवत्ती जलाते है !!”
सारे दुनिया को रौशन करुं
ये ख्वाब था मेरा
और तु मुझे छोड़ अब बम्
फोडता मिलता है .....
मैने सोचा था खुद जलजाऊँ
दुनिया को रौशनी देकर
तुने जलाना ही छोडकर मुझे
बस बमें फोडता हैं.....”

शनिवार, 12 अगस्त 2017

क्या देश से नफ़रत करते हो ?

गाते रहते अनेकों प्रेमगीत
किसी प्रेमी के लिये रोज तुम ।

क्युँ गाते नहीं बंदे मातरम्
क्या देश से नफरत करते  हो  ?

याद है गानें बिछडन के
प्यार के मिलन के ईश्वर के.....

क्युँ याद नहीं शहादत वो
युं बन भुलक्कड बैठे  हो ?

पागल हो किसी लडकी के पिछे
कभी देश को न पसंद किया !

इस देश से मिला है सबकुछ तुम्हे
बदले में तुमने क्या दिआ ?

अधिकारों के नारे लगा कर
तुम कर्तव्यों को जो भुले हो ।

ये भ्रष्टाचार तो तुमने फैलाया
तुम सब तो मन के मैले हो !!!!!

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

●●●●संस्कार●●●●


कुछ वक्त का तकाज़ा था
वहाँ बंदरोँ का तमाशा था ।।

नाच न पाये हम ये अपनी
उसुल पर तमाचा था  !!

वो करते रहे हम पर वार
हम सहते रहे मेरे यार ।।

वो बनगये थे जाहिल और
हम मेँ अब भी संस्कार था ।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

वतन प्रेम

प्रेम वतन से इतना है ,

मेरा देश कहता है

धरती को माँ

#भारत माता कि जयकारोँ
से
गुँजते
जन-गण-मन सारा यहाँ

तुम मानते नहीँ हो
अपना इसे

करते रहे हो
बर्बाद इसे

जब वतन से प्यार नहीँ
तेरा यहाँ रहना
हमेँ गवारा नहीँ

#दारुवाले #उल्लु कि #माँ को
एक #फतवा मेरा भी.....

#भरतमाता कि जय

मंगलवार, 7 मार्च 2017

●●●●●अनन्त प्रयत्न●●●●●

इतना विशाल यह गगन
मेरे नैन अति क्षुद्र
नभ सारा मैं
देख नहीं सकता ।

प्रशस्त है इतना पृथ्वी
और मैं जैसे एक चिटी
मुझमे वह बात कहाँ
उसे मैं समा नहीं सकता ।

इतना बडा है सागर
करोडों ग्यालेन जिसमें है जल
मैं नहीं आगस्त्य
उसे पीई नहीं सकता.....।

प्रबल पवन मुझसे
कितना बलवान
मैं सामान्य जीव
उड जाऊंगा उसे
झेल नहीं सकता ।

भीमकाय यह पर्वत
और मैं मात्र एक मुषक
नहीं मैं उसका वक्ष चीर सकता .....।

नहीं ! यदि ऐसे ही सोचे होते
हमारे पूर्वज
मानव सभ्यता न जन्म लेता ।

परास्त हमने हर
देवता को किया है
च्युंकि अनन्त सत् प्रयत्न के आगे
कोई टिक नहीं सकता ।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

------------क्लिंग्-------------

यदि मैं बिहार मे जन्म लेता
खुदको बिहारी
कहेजाने पर भी
गर्व करता ....

मैं राज्य ओडिशा मेजन्मा हुँ
गुजरात मे
मालिया कहते है लोग
मुझे दुःख नहीं होता...

जवाब में कहता हुँ
जी जनाब !
मैं मालि हुँ....
स्वौभाग्य मेरा
प्रभु के लिए
पुष्प चयन करता हुँ....

इसी तरह
पूर्वभारतीय द्वीपों मे
जब
जाता कोई हिन्दुस्तानी

क्लिंग् क्लिंग् कहते देख उनको
वहाँ के अधिवासी

इसमें मे भी
अपमान का एक
सुक्ष्म भेद है होता
किसी भी भारतीय को
क्यों ऐसा कहाजाता....

मुझे कहे कोई क्लिंग्
गर्व से छाती मे लगा लुगां...
ये वही कलिगं ही तो है
जिसकी केश छुआँ करती थी गंगा....

जब था नहीं वहाँ सभ्यता
हमने सिखाया था
चलना बोलना
वही उपकार उन्हें याद है
तभी तो आज भी
किसी भी भारतीय को
कलिगीं कहके
वह लोग पुकारते....

वि.द्र. => भारतीय मूल के लोगों को मालेशिया इंडोनेसिया मे keling तथा kling कहा जाता है । यह कलिंग शब्द का बदला हुआ रुप मात्र है ।
पहले भारतीयों के लिए यह शब्द सम्मानार्थक हुआ करता था । बाद मे यही शब्द उनको विदेशी बताने के लिए प्रयोग होने लगा.....

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

कवि कि खामोशी

कवि तेरी कलम कि खामोशी
शायद तेरे दिल के घाव भरगये
या वो संवेदी दिल मरगया....

तु खामोश हे किसी द्वन्द में
उलझा है जीवन कि उलझन में
या साधा कागज से डरगया......

तेरे शब्द हुए क्या अर्थहीन
वक्त के साथ तु हुआ अज्ञान
या दिल में भाव अभाव हुआ......

कवि तु थका तो नहीं है
चुप है क्युं
कलम से श्याही खत्म तो नहीं है
या जग वैरागी हो गया

बुधवार, 28 सितंबर 2016

योद्धा

योद्धा सिर्फ सैनिक ही नहीँ
बाढ़, चक्रवात, अकाल , साहुकारोँ से लढ़नेवाले मेरे कृषक भाई भी है योद्धा ।

योद्धा भी है मेरे मजदूर भाई
उनके मशीन से कुस्ती लढ़ने से
देश कि अर्थनीति को मिलती है
मज़बुती


योद्धा है यहाँ हर वो नागरिक
जिसे देश से हो प्यार
जो देश के लिये जिना जानता है
और मरना भी

योद्धा बस वो नहीँ जिसने बंदुक तलवार के नौक पर
दुनिया तमाम जीत लिया

योद्धा वो भी है
हार कर युद्ध भी जिसने मिठे वोल से ही दिल जीत लिया

एक योद्धा इंसानोँ को मार सकता है
जीवन से सदा
के लिये

एक योद्धा कलमकार है
उसके खाए चोट से
दुशमन जिँते जी मर जाते है


योद्धा एक जाति नहीँ
न है किसी क्षेत्र विशेष के लोगोँ का औदा

योद्धा वे सभी है
हारते नहीँ
जो लढ़ते रहे अन्त तक सदा

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

मैं देशद्रोही हो गया.....

जैसे अखलाक
बली चढ़ा धर्म के नाम
देश से बड़ा हो गया था

दीना माँझी लाश उठाए
अपने माटि समाज से
महान हो गये

कल तक
बाढ़ अकाल चक्रवात
ओर
तुम्हारे द्वेष घृणा से लढ़नेवाले

मेँ ,
मेरे Odia भाई बहन 4 करोड़
संवेदनहीन हो गये

दीना कि
एक बिवी क्या मरी
ये माहौल नफरतनुमा हो गया

मैँ बना
उनके नजरोँ मे
अब अलगाववादी

कलतक देशप्रेमी
अब देशद्रोही हो गया

उदवोधनी

#गंगा धोति थी केश जिसकी
#कृष्णा चरण तल
#श्मशान आज गरीबोँ का देश
यही वो #उत्कल

#लढ़ते थे कभी
#आतताय़ीओँ से
#धन देखकै
जलनेवालोँसे

आज #प्रकृति ही वैरी बनी है
कभी #जलमय मारे
कभी बिन जल

ये कितने #युग कि बात होगी
जऱा याद करना तुम याद करना

#हिमाचल के निचे
खड़े थे ये #जातिवीर
उठाए अपने #माथा
तुम भूला दिए हो वो #गाथा

#कलवर्ग #निजाम बना था
जब #हिन्दु द्वेषी
#गजपति वीर
#कपिलेन्द्र देव
हराए ,चढ़ाए उसको #फाँसी

दुर्वार गड़ #देवर_कोण्डा
गाए आज वही गाथा
#बारबाटी बीर दिए थे वहाँ
अपना उन्नत माथा
  
#याद कर याद करले तु आज
#शतगड़ कि #पवित्र_भूमि को
#अजेय_बंग सैन्य बाहिनी
गिर गये यहाँ
लौटे न अपने #वतन को

विजयी
#विजयनगर मागाँ था
उत्कलके चरणोँ मे जब शरण
बाहामनी पति
यवन राजा
जा छिपा अपने ही घरमे तक्षण

लढ़ा था वीर सुरेन्द्र साए
लढ़े थे चक्राविशोइ
जयीराजगुरु बक्सी कि
धरती आज श्रीहीन
पड़ा है
तब याद न करता कोई

यहीँ जन्मे थे
सुभाष
यह थी श्रीचैतन्य कि कर्मभूमि
श्रीकृष्ण यहाँ जगन्नाथ हुए
ये वही बौध जैनोँ कि भूमि

ब्य़ापारी थे हम
ब्य़ापार करते थे
जाभा बोर्णिओ
चीन जापान से
ये इतिहास भी अब
कोइ नहीँ पढ़ाता
इस देश के शिक्षानुष्ठानोँ मे

गौड़ भुवन हुआ था पदानत
मगध का सूर्य किए थे लीन
न रखना कभी गलतफैमी
इस धरती के पुत्र
न थे न हे कभी किसी से हीन

न उलझों भारत हमसे

मारदिए जाते
कहीँ गर्भ मे कन्या
उस देश के लोग आते है
मेरे माटि के कन्या को
बहू बना
वो अपने देश ले जाते है

जहाँ
वहा था खुन नदी बनकर
लोग हँसते हँसते बलि चढ़गये
न रखा
#भारत तुझसे वैर
हम वो अपमान भी भूला दिए

ये मिट्टी वो मिट्टी है प्यारे
जहाँ जातपात का भेद नहीँ
हम जिँईते है एक झंडे तले
यहाँ दलित सवर्णोँ मेँ रंज नहीँ

कोई CM नहीँ न राजा कोई
यहाँ एक जगन्नाथ ही राजा है
न उलझो हमसे तुम #भारत
हमेँ लढ़ना आता है
हम भूले नही

सह लेगें.....

सहन कर सकता हुँ
किसी के मुख से मेरे लिए
कटु अपशब्द....

सहन हो जाते
कोइ मुझे जितना चाहे
मारे पिटे चाहे
कर दे मेरा बध .....

सहन न होगा
कोइ मेरा घर, परिवार को बदनाम करने लगे....

सह सकता हुँ
तुम मुझे कहो
गर मूर्ख अथवा
संवेदनहीन

सहन न होते
मेरी माँ माटि पर
बेवजह कोइ
उँगली उठाने लगे

सह सकते है
सहने को
हम गरीब
12 Km. चलने का दर्द

सहन न होगा
कोई कह दे
मेरी माँ कि
परवरिश को ही गलत

सह सकते है
झेल सकते है
लाखोँ बाढ़ चक्रवात अकाल
का मार

सह लेगेँ
आए जितनी अड़चने
लड़ेगेँ
मरेगेँ
न डरेगेँ हम वीर ओड़िआ........।

#बन्दे_उत्कल_जननी

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

खुन और जात

जब खुन खुन कि
बात चला
रे खुन बता
तु कौन जात है ?

कई जानवर काटे
अपने अंग काटे
तु न बदला
तेरा एक रंग

तब एक जाति
ये मानवजाति
क्युँ जात धर्म मे बँटगये ?



वो...

वो समझते है कमजोर मुझे
मेरी हिम्मत उन्होनेँ माँपी नहीँ
मैँ तीली सही जब जलता हुँ
जला सकता हुँ साथ गाँव कई

वो समझते है मजबुर मुझे
मेरी हैसियत उनके जैसा नहीँ
मैँ फकीर हुँ उन लकीरोँ का
जिसे मिटा न सके आए गए कई

उन्हे लगा मैँ बेवस लाचार हुँ
मेरे पास देने को कुछ नहीँ
प्यार बाँटे बहुत जगवालोँ मे
अमीर दिल से रहा हुँ मैँ धनी



वो सोचते है मैँ हार गया
उनके एक धमकी से ही डरगया
ये खुन है खंडायत याद रखना
मैँ मर सकता हुँ
कुत्तोँ से डरता नहीँ



गलत और सही

उसने दिखाया मुझे
आईने मे
मेरा ही शक्ल
युँ बौखलाया
जैसे वो मैँ नहीँ
कोई और ही था

वो कोई और ही था
उसे गलतफैमी हो गई
या मैँ ही गलत था
मुझसे गलती हो गई

मैँ कैसे कह दुँ
अपने ही मुँह से
कि मैँ गलत हुँ
मैँ भी ईश्वर कि
सृष्टि हुँ
मैँ गलत तब
वो भी गलत हुआ ।

कोई कैसे कह दे
गलत कौन सही ?
युँ भी कोई कह सके
ऐसा कोई हुआ नहीँ !
कोई हुआ नहीँ
सिबा उसके यहाँ
रब जिसका साथ देँ
बस वही है सही !






गुरुवार, 4 अगस्त 2016

आजके देशभक्त

अब ईश्क है सिर्फ बिवि से
और बच्चोँ से है लगाव

जात धर्म और ज्ञाती कुटुम्ब के झमेलोँ मे सब
माटी , माँ को भूल गये

अब सुख चैन है धन से ही
धन लाए
धन से खाए
धन उडाए
मौज मनाएँ
धन के लिए
धरती को भी भूल गये

अब सुख के पिछे दौड़ते है
नहीँ देश के लिए मरते है
दो दिन कि देशभक्ति से
देशप्रेमी वे बनगये

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

वह कौन लोग है

वह कौन लोग हे
रोज जग मे जो बम् फोड़ते है

वह कौन लोग हे
धर्म के नाम पर देश तोड़ते है

वह कौन लोग हे
बन्दुक के बल आतक फैलाते है

वह कौन लोग हे
नारी का अपमान रोज करते है

वह कौन लोग है
जिनके पूर्वजोँ ने लाखोँ मंदिर तोडे
और एक मसजीद के लिये
अब दिनरात सर फोड़ते है ।

वो कौन लोग है
मुफ्त का मिलता है
तब चट कर जाते
और सेना के जवानोँ पर पथ्थर मारते है (कश्मीरी ) ।

वह कौन लोग है
भारत मे जन्मे
लेकिन अरबीओँ कि खटते है
[अरबी Means -ISIS,BOKOHARAM,अलकाएदा]

रविवार, 1 मई 2016

अग्निवर्षा

जलते तपते सूर्य कि हो रही अग्नी वर्षा
तरसते जीव जल को
बढ़ा है तृषा

बाबु हो शीतताप नियन्त्रित
कक्ष मे आप
न जानते  ,
न होगा प्राणीओँ का
दर्द का तुम्हे एहसास

तुम्हे लगता होगा
रवि किरण च्युँकि
कनकरंग
सो हितकारी

करो साक्षात क्षण भर
दोपहर
प्रभाकर से
मिटेगा तत्काल हर
भ्रान्ति मनसे
अति मे हित न होइ

झड़ते उड़ते पत्तोँ को 
देखो
पुछो उनसे ,
उनका ये हाल किसने किया !

हराभरा जो
अंग थे कलतक उनके
कौन बाहुबली से
भयभीत हो
वह
पीत्त वर्ण सा हुआ

सुखे तालाबोँ से पुछो
क्युँ आज वे दिख रहे विवर्ण
दम तोड़ते मछली
चिन्तित वगुला
उनका यह हाल
कैसे हुआ किसने किया !

तुम प्रकृति पर कर रहे निरन्तर
जो अत्याचार
हाँ तुम ही हो
इन रौत्रताप के जिम्मेदार !

फिर न कहना किसीसे
इतना सुखा
लु से मौतेँ
ये किसने है किया !
हाँ तुम ही कारक हो
ये तुमने है किया !!

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

मेरी मौत.......

मेरी मौत तुझे मौका दे जाए......
हो बर्बाद मेरी चाहत
तुझे सुकुन मिलजाए.......

में मरुँ तु अमर हो जा
मिले थे चंद फुरसत के पल
वो तु लै जा.....

..
मेरा अन्त तुझे आबाद कर जाय

मेरे आँखों के आँसू
तेरी प्यास बुझा जाय

बचगये है सुख के जितने क्षण....
मुफ्त नहीं है बिरादर
तेरा दर्द दे
मेरा चैन ले जा.........

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

ए दिल ऐ दुशमन मेरे

देख लेँ आँख खोलकर
दिल ए दुशमन मेरे ।

नफरत का ये आलाम
जाहाँ मेँ आम बना है ।

छाया है मौत का सामान
दिल और हवा मेँ

जबतब तुझसे
नफरत का पैगाम मिला है

वो तु ही था न जमानेँ से
मुझ पर वार करनेवाला ।

हमनेँ तो अभी अभी
अपना आँख भर खोला है ।

शान्तिदूत बनकर
न सुना अब
तु नयी कहानी ।

ये पाक बंगालादेश सब बताते
तेरी निशानी ।

तुनेँ ही तोड़ा था हिँदोस्थान
बनकर वैगाना ।

और हम ही भरते रहे
वक्त को हरजाना ।

आया है वक्त जान लो
बदलेगेँ अब जमाना ।

न चलनेदेगेँ देश मेँ
देशद्रोहीओँ का घराना ।