लेबल
- अनुवाद (3)
- कविता (47)
- काहानी (8)
- जीवन अनुभव (38)
- तर्क वितर्क (4)
- दिल से (16)
- पदचिन्ह (7)
- व्यंग्य (8)
- शब्द परिचय (7)
- हास्य कविता (1)
मंगलवार, 17 जून 2014
यादेँ
यादेँ भाग 1
बुधवार, 23 अप्रैल 2014
समयराग
वो घंट नैवेद्य कहाँ गये अब तो शंख के ध्वनी भी दुर्लभ हे.....
क्या गलति हुआ हमसे जो हमेँ भगवान छोड़गये....
.धर्म के नाम पर दंगे होते, हो रहा हे बलात्कार.....
गलि गलि मेँ देख झाँक कर, नारी सहती हे अत्याचार....
दुषित हुआ हे जल और वायु, दुषित हुआ हे सबका मन .....
भारतवर्ष मेँ कोई ज्ञान देखता लोग देखते हे केवल धन......
.धन के लिये मनमुटाव धन के लिये दुःख संताप.......
फिर भी इंसान दिनरात देखते रहते इसीके ख्वाब,,,,,,,
और क्या कहुँ यही सबसे हुँ परेशान जनाब......,
बुधवार, 29 जनवरी 2014
आज वो इंसान याद आया !
गुजरात का वो इंसान आज मुझे क्युँ याद आया ?
चलता था वो धीरे धीरे,
कहता था पक्की बात, न मिला हुँ मेँ उसे फिर मुझे क्युँ याद आया ?
कि थी जिसने शंखनाद किया था जिसने शुरवाद आज वो महात्मा याद आया !
एक किया था देश सारा जोश जगया था जवानोँ मेँ, मुझे वो बुजुर्ग याद आया !
आज करते हे वदनाम उसे , कहते वेईमान उसे , था वो कैसा पता नहीँ , वो महान आत्मा याद आया !
धर्म जात को न माननेवाला इंसानियात को बचानेवाला एक आम इंसान याद आया !
(30 JANUARY 2014)
गुरुवार, 19 दिसंबर 2013
Good bye 2013 !!!
जाते जाते फिर याद आये तुम..... ।
जबतक है जान याद आओगे तुम ....।।
तुमसे मिला जो पहले कभी न मिला था.... ।
ये होठोँ पर हसी ऐसे कभी न खिला था ।।
तमसे मिलेँ कुछ गम के आंसु भी ।
आब जिंदेगी मेँ वो सब याद बनजायेगी ।।
तुमने मिलाया कई नये मेहमानोँ से ।
घर गुंज उठा उनके किलकारीयोँ से ।।
तुमने छीना कई पुराने दोस्तोँ को ।
तोड दिआ कईओँ से रिस्ते को ।।
फिर भी दोस्त तुम याद आओगे ।
हमेँ पता है तुम वापस न आओगे ।।
Good bye 2013 ।।
बुधवार, 16 अक्टूबर 2013
मत कहना मुझे...
मत कहना मुझे हिन्दुस्तानी मेँ न्यु ईंड़िया मेँ रहता हुँ !
सरकार करे चाहेँ कुछ भी मेँ सपनोँ मेँ ड़ुबा रहता हुँ !
चुल्हे मेँ जाय देश
मेँ आपनी फायदा ही देखता हुँ
किसी गाँव मेँ नहीँ भैया जी
मेँ नई दिल्ली मेँ रहता हुँ !
ये आखरी शाम ये आखरी रात है...
ये आखरी शाम ये आखरी रात हे..,
मेँ क्युँ करु फिकर कल की मुझे इस पल मेँ ही जीना हैँ...,
अकेला हुँ आज मेँ नहीँ चाहिये और कोई युँ तो मिले थे कई दोस्त मगर अब चाँद हमारे साथ है !
मुझे जीनाँ है हर पल मेँ आज और ये पल भी बीत जाना है..
जो करते फिकर कल की उन्हे मन ही मन मेँ रोना है..,,
! ये आखरी शाम ये आखरी रात है,..,,,
क्या फायदा जी कर हजारोँ साल मुझे क्युँ की जीँदेगी जीनेँ के लिये सच्चाई का एक पल ही काफी है
(14 sept 2013 हिन्दी दिवस पर लिखागया )