शनिवार, 4 अप्रैल 2020

लंगूर व बुढी औरत

बुढ़ापा आते हीँ आँख को कम दिखने लगता है
हर चीज अस्पष्ट दिखता है ।

इस विषय पर हमारे गाँव मेँ एक मजेदार किस्सा अकसर लोग सुनाते ;-)

गाँव की विश्वाल परिवार कि एक बुढ़ी औरत
हर शाम 5 से 6 बजे के द्वरान
बांध की और शौच हेतु जाती थीँ

एकबार वो शौच स्नान आदि खत्म कर घर को लौट रही थी

थोड़ा अंधेरा हो गया था ।

आते हुए उसने उनके
बाड़ी के पास एक लंगुर रस्ते को लगते हुए बैठा था ।
:-D :-D :-D :-D :-D
उस बुढ़ी औरत को लगा की मानोँ कोई व्यक्ति वहाँ बैठकर शौच कर रहा है और पराई स्त्री को देख कर भी उसमेँ इतना मर्यादा नहीँ की वो खडा नहीँ हो जाता ।
:-D :-D :-D :-D :-D :-D  

उस बुढ़ी औरत को ठिक से दिख नहीँ रहा था की एक लंगुर है

उसने उस लंगुर के नजदिक जाकर कहा

कौन है रे तु तुझमेँ इतना भी शर्म नहीँ तु औरत के सामने बैठकर शौच करने लगा :-D :-D :-D (हगने लगा:-D :-D)

अब पतानहीँ उस लंगुर ने क्या समझा उठकर उस बुढ़िया के गाल मेँ जोरदार तमाचा लगादिया ।
:-D :-D :-D :-P :-P :-P

वो बुढ़ी औरत थप्पड खाने के बाद रोते हुए घर लौटी । घरवालोँ को बताया ,उन्होनेँ खोजबीन की तो पताचला एक घायल हुआ एक लंगुर जो अब भी वहाँ बैठा था शायद उसी नेँ बुढ़िया के गाल लाल किया था ।
:-D :-D :-P :-P

बुधवार, 18 जुलाई 2018

उपनाम

नारीवादी आंदोलन में नारा देते हुए:-
“बन्द करो !
बन्द करो !
शादी के बाद
लेडकीओं का उपनाम बदलना बंदकरो !”

अमरवा ने
एक आंदोलनकारी से पुछा....
भैया आखिरकार उपनाम बदलने में आप लोगों को क्या तकलीफ हो रही है
अडचनें आएगें भी तो लेडकिओं को होगी...न....

आन्दोलनकारी युवक वोला
यार असल में स्कूल में पढते समय हमारे साथ पढनेवाली लडकियों को फेसबुक में ढुंढने में मुस्किल हो रही है....
तभी हम धरने में बैठे है.....
😀😀😀

शनिवार, 30 जून 2018

डॉक्टर डे

भारत मेँ आज 1 जुलाई डॉक्टरोँ का खास दिन राष्ट्रिय चिकित्सक दिवस यानी की #National_Dooctors_Day  हे । India that is भारत देश मेँ इसकी शुरुवात
भारत सरकार द्वारा 1991 मे किया गया था  । 

1 जुलाई 1882 को पटना, बिहार मेँ प्रसिद्ध भारतीय चिकत्सक Dr B.C ROY [Bidhan Chandra Roy] का जन्म हुआ था और एक जुलाई को ही 80 वर्ष के उर्म मेँ 1962 को इंतकाल हो गया था !  

चिकत्सा क्षेत्र मेँ उनके वहुमूल्य योगदान के लिये  भारत सरकार ने उनके जन्म व मृत्युदिवस को National Docters Day का दर्जा दिलाया ।

विधान चंद्र रॉय ने कोलकत्ता मेँ अपनी मेडिकाल ग्रेजुएसन पुरा किया था और लंदन से वे 1911  को MRCP और FRCS डिग्री लेकर के भारत मेँ मेडिकल प्रक्टिस के लिये लौटे !

उसी वर्ष वे कोलकत्ता मेडिकल कॉलेज से मेडिकल शिक्षक के तौर पर  जुडे और बादमेँ Campbell Medical School व Carmichael Medical College मेँ भी कुछदिनोँ के लिये कार्यरत थे ।

इस बिच महात्मा गांधी के नेतृत्वमे हो रहे अहिँसक आंदोलन मेँ भी उन्होने भागलिया ।

  स्वतंत्रता के पश्चात वे कंग्रेस लिडर बने और  पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री भी !

भारत सरकार ने उनको 4 फरवरी 1961 मे भारतरन्त पुरस्कार से सन्मानित किया था

और

1976 से हरवर्ष उत्कृष्ट डक्टरोँ को चिकित्सा के क्षेत्र मेँ उनके अछे काम के लिये Dr. B. C. Roy National Award दिया जा रहा है ।

वहीँ विश्व मेँ सबसे पहले डॉक्टर डे  Doctors’ Day 30 March, 1933, विन्डर [Winder] जर्जिआ मे मनाया गया था ।

इसे मनाने कि Idea Dr. Charles B Almond कि पत्नी  Eudora Brown Almond को सबसे पहले आयी थी ।

उन्होने सुझाव दिया कि प्रथम सफल साधारण anesthesiain surgery च्युँकि  March 30, 1842, को  Jefferson , Ga. Dr.  Crawford Longused etherto ने किया था इसी दिन को डॉक्टर डे के रुप मेँ मनाया जाय । उसी वर्ष जर्जिआ मेँ कुछ डॉक्टरोँ ने मिलकर डॉक्टर डे मनाया ।
  October 30, 1990 को US पार्लामेँट ने कानुन पारित कर 30 मार्च को United nation का National Doctor's Day के रुप मेँ दर्जा दिया था । 

ड़ॉक्टर डे मेँ डॉक्टरोँ को समाज के सेवाहेतु नूतन उर्जा मिलता है ।

भारतीय डॉक्टरोँ से अनुरोध हे कि वे अपनी सेवा सिर्फ गाँव तक सीमित न रखते हुए गाँव के दूर्गम क्षेत्रोँ मेँ भी चिकित्सा सेवा मुहैया कराएँ तभी #DOCTERSDAY मनाये जाने के पिछे का उद्देश्य सफल होगा ।

रविवार, 15 अप्रैल 2018

नग-नगर-नागरिक

नागरिक शब्द बना
नगर+इक=नागरिक
नगर शब्द का निरुक्ति
=>नग+(है अर्थ में)र
नग शब्द का निरुक्ति =न+गम् धातु+कर्त्तु.अ=नग
नः ग....
यानी जो गति नहीं करता वह नग है ।
नग शब्द के कई संस्कृतगत अर्थ है
जैसे कि .....
१.वृक्ष
२.पर्वत
३.सात संख्या
४.सर्प
५.सूर्य

अब ज़रा आते हैं नगर पर
आज विश्व में अधिकांश नगरों में
वृक्ष कहाँ है....?
वृक्ष तो गांव में हीं बचगये है.....

पर्वत तो सहरों में होते है
परंतु सभी सहरों में पर्वत होते हो जरूरी तो नहीं है.... हां आधुनिक मानव पर्वत से भी उँचे महल बनवा रहा है सहरों में.....
पर्वत होते भी है तो उन्हें पूछता कौन है यहां.....?

सर्प और सहर तो एक दूसरे के शत्रु कहे जा सकते है । पैर न होनेवाला ये सरिसृप बेचारा सहर में कहीं मानवों के दिखगया तो
उसकी खैर नहीं हां परंतु सहरों में सर्पिल मनुष्य बहुतरे मिलजाते है ओर वह सर्पों से कई गुना ज्यादे ख़तरनाक़ होते हैं । असली सर्प तो बस गांव में बचगये है एक-आद सहरों में होगें तो डरे सहमें रहते होगें.....

ओर
अन्ततः सूर्य.....
खैर सूर्य हर कहीं होता है चाहें गांव हो या सहर हो,मरुस्थल हो या हिमालय के चोटी में हर कहीं सूरज मिलजाता है....
परंतु सहरों में उंचे उंचे मकानों नें सूरज को भी छिपादेने का अद्भुत कार्य किया है । सहरों में सूरज,चांद ओर तारों को न देखेजाने का परंपरा रहा है । सहरों में इसलिए लोग मानवों में
सूर्य चंद्र सितारों को अन्वेषण करते है ।

इसलिए आजकल कोई city के लिए भारतीय शब्द ‛नगर’ नहीं कहता
लोग अब वैदेशिक शब्द ‛सहर’ कहने लगे है.....

रविवार, 7 जनवरी 2018

Wrong गलत त्रुटिपूर्ण

मध्य अंग्रेजी शब्द wrong
पुराने अंग्रेज़ी शब्द wrang
का आधुनिक अपभ्रंश है
(पहले wrang का अर्थ था "भूल, मुड़, असमान"),
ओर wrang शब्द पुराना नॉर्स भाषाके
शब्द rangr(मूल-vrangr)से आया है ।
(पहले rangr का अर्थ था "कुटिल, भूल")

ओर
rangr शब्द आया है
प्रोटो-जर्मनिक शब्द wrangaz से....
(*wrangaz का अर्थ हुआ करता थाकुटिल, मुड़, विकृत हो जाना")
वहीं *wrangaz शब्द बहुत संभव
इन प्रोटो-इंडो-यूरोपीय शब्दों से आया होनाअनुमान किया जाता है.....

wer, -, * werǵ -, * wrengʰ-
("मोड़, बुनाई, एकसाथ tie होना ")
ओर
यदि इन शब्दों से wrangaz शब्द का कोई संबंध है तो
उसका मूल होगा
एक प्रोटो-इंडो-यूरोपियन शब्द
wer-("बारी, मोड़")

शब्द werǵ
ईरान में warĵ हुआ ओर भारत में
संस्कृत ने
उसे वृज किया ओर यही
शब्दयुरोप में *wérǵom
होकर फिर बार बार अपना रुप
बदलकर (*werką=>worc,weorc,ġeweorc=>work)
Work यानी कार्य बना.....
वहींभारत में इसके
दो फर्म*.
*wérǵ-o-m*ओर
*wr̥ǵ-tó-sसे
बहुत बदलाव के साथ
एक शब्द बना
स्ववृष्टि(स्वयंकरना,इंद्र कि एक नाम,उपाधि)
Wrong के लिये
संस्कृत में आप कहसकते हो
#त्रुटिपूर्ण
वहीं हिंदी में सर्वाधिक लोकप्रिय शब्द
ग़लत आया है एक पार्सी शब्द غلطसे.......(Wiktionary)

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

क्या कर्ण का जन्म कान से हुआ था ?

क्या कर्ण्ण का जन्म कुन्तीजी के कान से हुआ था इसलिए उनका नाम कर्ण रखागया या जन्म के समय कर्ण के कानों में सूर्य प्रदत्त कुण्डल था इसलिए उनका नाम कर्ण हुआ ....

कुछ लोग आम तौर पर कर्ण के नाम पर यह दोनों मत सुनाया करते है
लेकिन क्या यह बात सच है ?

चलिए जानते है इन बातों में कितनी सच्चाई है.....
पुराणों में
कर्ण्ण को कानीन् कहागया है
कान से जन्में इसलिए कानीन् नहीं 😀
दरसल कानीन् शब्द का अर्थ
है वह पुत्र जो अविवाहित माता के गर्भ से जन्में हो....
नियुक्ति=>कन्या+अपत्यार्थे.इन्=कानीन्

हमारे देशज कान शब्द का संस्कृत प्रतिशब्द
है कर्ण्ण...
इसका निरुक्ति=कर्ण्णि धातु(सुनना)+करण.अ
पर
हमारे महाभारत कथा में पात्र
कर्ण के नाम का नियुक्ति
उससे भिन्न है
कृ धातु(करना)+कर्तु.न=कर्ण(नाम)

कृ धातु का 25 से ज्यादा अर्थ है
पर यहां करने के अर्थ में प
प्रयुक्त हुआ है ....

उसी तरह संस्कृत विशेष्य शब्द
न का पांच अर्थों में से
रण व दान यहां ग्रहण योग्य लग रहा है ..

कुल मिलाकर
कृ धातु+कर्तु.न=कर्ण
इस निरुक्ति व्याख्या
यह है
कि जो दानकरे तथा रणप्रिय है
वो कर्ण है......

महाभारत के वनपर्व अंतर्गत कुंडलाहरन पर्व में कर्ण जन्म प्रसंग आता है
वहां कहीं भी नहीं लिखा गया है कि कर्ण का जन्म कान से हुआ था....

वहां  लिखा है ....

ततः कालेन सा गर्भे सुपुवे वरवर्णिनी ।
कनैव तस्य देवस्य प्रसादादमरप्रभम् ।।

(भावार्थ:-तदनन्तर सुन्दरी पृथाके गर्भ से यथा समय सूर्यदेव के कृपा से कन्या रहते हुए ही देवताओं के भांति एक तेजस्वी पुत्र के जन्म हुआ)

इन सब बातों से स्पष्ट होता है कि
राधा पुत्र राधैय का नाम
उनके दानी गुण व रण कौशल में पारंगत होने के बाद कर्ण पडा़ था......

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

Children day special;कैसे बच्चे बनगये डॉलफिन

कैलिफोर्निया के
सुमास कवीले में एक दंतकथा है ।
उनका मानना है कि बहुत साल पहले
उनकी देवी हुतास्
चाहती थी कि जो द्वीप में रहते है वो mainland में चलेजाएँ
तो उन्होंने एक पूल बनाया
Rainbow से
सब लोग उस रेनवो को पार कर रहे थे
मैन लैंड कि तरफ जाने के लिए exited थे 
बच्चे उच्छल रहे थे
बहुत मजे़ कररहे थे
नाच रहे थे
अब आप जानते ही होगें
बच्चे कैसे मजे़ करते है
खैर
उन बच्चों में से बहुत से बच्चे
इत्ते उधम मचाने लगे कि
एक दुसरे को
धक्का मुक्की का खेल खेलने लगे
इससे यह हुआ कि बहुत से बच्चे
बीच समंदर में ही गिरने लगे
उनको बचाने के लिए
कोई भी बडा आदमी आगे न आया
च्यूंकि उन्हें डर था की कहीं
इससे उनकी
देवी ह्युतास् उनसे नाराज़ न हो जाय .......
पर हुतास् नें उन्हें बचालिया
उन बच्चों का खेलना
हुतास् को बहुत पसंद आया
तो
उसी पल् जब बच्चे पानी में गिरे
उन्होंने उन बच्चों को डॉल्फिन्स बनादिया
ताकि वो हमेशा हमेशा खेल सके ....

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

मूर्ति ओर शिल्पकार

एक शिल्पकार हुआ करता था ।
उसे एक दिन एक पत्थर मिला ....
एक बहुत ही खास् पत्थर जो ऐसे ही
कहीं से नहीं मिलता हो ....
ओर तब
वो उसे घर ले आया व महिनों तक
बडे ही ध्यान से
उसपर काम करता रहा...
जबतक कि काम पुरा न हुआ वो
उसपर लगा रहा
उसने ओर कुछ भी नहीं सोचता था
उस समय उसके लिए
एक यही मूर्ति ही अहम थी ओर कुछ नहीं...

जब वो मूर्ति बनकर तैयार हो गयी
उसने वो मूर्ति अपने दोस्तों को दिखाया....
ओर उन्होंने काहा
ये मूर्ति तो सचमें लाजवाब है यार....!

ओर तब उस शिल्पकार ने चाय कि चुस्कियां लेते हुए बडे ही सहजता से
काहा
उसने तो कुछ भी नहीं किया है....
उस पत्थर में तो मूर्ति पहले से ही थीं....
उसने तो बस थोडे बहुत टुकड़े हटाए थे.....

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

एक दीप नें कहा.....

युं तो दीपावली का त्यौहार चलागया
ओर फिर अगले साल आएगा
लेकिन
बुझाया हुआ एक दीप कहरहा है
कि

“तेरे धुएँ और शोर से घुटघुट कर
मरगयी गालिब !!!!
लोग भूले नहीं मुझे मेरे बदले
मोमवत्ती जलाते है !!”
सारे दुनिया को रौशन करुं
ये ख्वाब था मेरा
और तु मुझे छोड़ अब बम्
फोडता मिलता है .....
मैने सोचा था खुद जलजाऊँ
दुनिया को रौशनी देकर
तुने जलाना ही छोडकर मुझे
बस बमें फोडता हैं.....”

शनिवार, 23 सितंबर 2017

शराब कि कहानी

प्राचीन विश्व में सबसे प्राचीन सभ्यता भारत का ही रहा है....
भारत में ही अन्न के रुप में 10000 साल पहले
सर्वप्रथम जवधान कि खेती हुआ करता था ऐसा वैज्ञानिक कहरहे है...
बहुत संभव भारतीय नारीओं ने
नाना प्रकार के व्यंजनों का उद्भावन किया हो...
शायद वो कोई “आचारप्रिया” नारी ही थी जिसने
“खट्टे फलों” से रस निकाल कर उनके
रस संग्रह के बारे में सोचा था...

ओर शायद किसी ओर नारी के मन में आया होगा
चलो देखते है
सिर्का को आग में तपाने से क्या होता है ????

तो शायद ऐसे ही शराब का उद्भावन हुआ हो

किसे पता......?

यह तो बस एक अनुमान ही है 

लेकिन जैसा कि हम बर्तमान में नारीओं द्वारा
मद्य के प्रति तिरस्कार को देखते है...
हमारे मन में यह शंका उत्पन्न होता है कि आखिर क्यों नारीओं को शराब से इतनी
मानसिक आलर्जी होती है ?
कहीं ये वही प्राचीन नारी कि डिएने का कोडिंग
जेनेटिक प्रतिक्रिया तो नहीं है ?
हो न हो सिर्का को आगमें तपा कर उस प्राचीननारी ने
जब उसे शराब बनाया ओर उसका नकारात्मक प्रभाव देखा उसे स्वभावतः उससे घृणा हो गयी
ओर वह घृणा आजतक नारीओं में दिखाई देता है....
खैर हम इसके बारे में बस अंदाजा ही लगासकते है....

तो चलिए चलते चलते जान लेते है शराब के प्रकार भेद के बारे में......

वैद्य शास्त्र के हिसाब से
मद्य या शराब कई प्रकार के होते है ....

द्र:-

1.→गौडी–(गुड़ व माधुकि फुल से )
2.→पैष्टी–(तंडुल,जौ,गेहुं आदि से )
3.→माध्वी–(मधु तथा अन्य पुष्प रस से)
4.→कादंबरी-(कई प्रकार के रस मिलाकर)
5.→माधुकी–(महुआ के पुष्प से)
6.→मैरेयी–(विल्व वृक्ष के जड़,वेर तथा   
                           शर्करा से)
7.→मार्द्दिक–(द्राक्षा फल  यानी अंगुर से)
                      

                    -सुरा-
सुर यानी देवताओं का पेय होने के कारण
मद्य का एक नाम सुरा कहलाया...
कहते है समुद्रमंथन से देवताओं को सुरा प्राप्त हुआ था......

●मनुसंहिता में सुरा को तीन श्रेणियों में बांटा गया है..●

1.गौडी→(गुड़ व माधुकी पुष्प से )
2.पैष्टी →(तंडुल आदि खाद्यान्नों से)
3.माध्वी→(शहद तथा पुष्प रससे)

  ●--------★मदिरा★---------●
सनातनी पुराणों के मुताबिक
राक्षसों को सागरमंथन से यह नशीली पेय प्राप्त हुआ था....

प्रस्तुतिकरण विधि मुताबिक
मदिरा को दो मुख्य भागों में बांटा जाता है...

1.→★अभिस्रवित★≈(O=अरखी शराब)
जिस तरह के मद्य में तपाते समय उसके फेनयुक्त रसको वकयन्त्र द्वारा संगृहीत किया जाता है ।

2.→★पर्युसित★≈
सिर्का को सढाकर बनाए गये शराब

●●“जटाधार शास्त्र में ”–
12 प्रकार के मदिरा के बारे में बताया गया है....

       
1.→माध्वीक→(शहद तथा पुष्परस)
2.→पानस→(पनस यानी कि कटसल फल से)
3.→द्राक्ष→(अंगूर के रस से)
4.→खर्जुर→(खजुर के रससे)
5.→ताल: →(ताड़ वृक्ष के रससे)
6.ऐक्क्षव→(ईक्क्षु यानी गन्ने के रससे)
7.→मैरेयी→(धायी पुष्प व गुड़ से)
8.→माक्षिक→(एक तरह के मधुमक्खी के शहद से)
9.→टांक→(सोमलता रससे)
10.→मधुक→(महुआ के पुष्प से)
11.→नारीकेलक(नारियल के पैड से)
12.→अन्नविकारोत्थ(कई प्रकार के खाद्यान्न से)

इनमें से ताड़ व खजुर मद्य पर्युसित है ओर बाकी अभिस्रवित प्रस्तुतिकरण विधि से बनाया जाता है....
इसके अलावा क्वाथ से भी एक तरह की मदिरा बनता है जिसे “अरिष्ट” कहाजाता है ।

एक ओर आम मत के हिसाब से...
1.→धान व चावल से बने शराब को सुरा,
2.→जौ से बने शराब को कोहलं
3.→गेहूँ से बने शराब को मधुलिका
4.→मिठे रस से बने शराब को शिधु
5.→गुड़ के शराब को गौडी
6.→द्राक्षा या अंगूर शराब को माधूक कहाजाता है

बहरहाल
सुरा तथा मदिरा दोनों ही मद्य अंतर्गत आते है
दोनों को ही ब्राह्मणों द्वारा सेवन निषिद्ध बताया गया है ।

व्याकरणगत
निरुक्ति नियम देखने पर भी हमें मद्य के
सकारात्मक व नकारात्मक पक्ष दिखाई पडते है....
मद् धातु+णिच+कर्त्तु. य=मद्य
वहीं
मदिरा=मदिर+आ
  ओर मदिर= मद् धातु+कर्त्तु. इर

दोनों ही शब्द में
मूल धातु शब्द मद् धातु ही है.....

ओर इस मद् धातु के कई अर्थ बताये जाते है
जैसे कि...
1.हृष्ठ होना....(स्वास्थ्यवान होना)
2.मत्त होना(मदमत्त, उन्मत्त होना)
3.ज्ञान शून्य होना
4.द्वेष करना....

मद्य चाहें वो सुरा हो या मदिरा....
उसे देवता पिते हो या राक्षस
यदि वह उसे अल्प मात्रा में पान करते है
एक दवा के तरह तो वो हृष्टकारक है
यदि मात्राधिक हुआ तब
व्यक्ति नशाग्रस्त हो मदमत्त,ज्ञानशून्य हो
वहकी वहकी बातें करने लगता है
ओर उनके बारे में बातें ज्यादा ही करता है जिससे वो जलता हो नफरत करता हो ....
ओर यहां हम मद्य को द्वेषबृद्धिकारक तत्व के रुप में देख रहे है....

मद्य के नकारात्मक पक्ष को देखते हुए ही लोगों ने इसका भावनात्मक व्यख्या भी किया है.....
कुछ लोगों के हिसाब से
मद्य=म=>मरण
द=दरिद्र
य=यमगृह गमन....

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

●इमली ओर नीम कि कथा●


पूर्वभारतीय द्वीपों में एक राजा एकबार भारत घुमने आया था...
उसने यहां ईमली चखा ओर
उससे वो इतना प्रभावित हुआ कि
जाते वक्त भारत से जाहजों में भरभर कर  इमली के बीज ले गया......

उसने उसके देश में
ईमली के पौधे लगाने कि आदेश जारी करदिया...

ईमली के पौधे जब बडे हो गये उसने आदेश जारी करवाया कि मेरे देशके सभी जनता
ईमलीके पत्तों का साग खाएंगे....
ईमली के पेडों के नीचे शयन तथा उपवेष्टन करेंगे..
ईमली के शाखा से मंजन किया करेगें....
ईमली के फल व बीज से तरकारी बनाएगें....

राज आदेशका प्रजा ने आदर सहित पालन किया

परन्तु देखा गया देशमें
लोग बिमार होनेलगे....

वह राजा जो ईमली के माया से नाचरहा था
अब चिंतित रहने लगा....

एक दिन भारत से एक व्यापारी से राजा कि भेंट हुई...

राजा ने अपने राज्य का बुरा हाल उस व्यापारी को कह सुनाया....

भारतीय व्यापारी ने कहा
वो कल अपने देश कलिंग चला जाएगा ओर वहां से लौटते समय
इस समस्या का समाधान लेकर लौटेगा.....

कुछ महिनों बाद
उस
राजाका दरवार लगा था....
तभी वो साधव व्यापारी
राजदरवार में
कुछ पौधे व  अनजाने बीज लेकर हाजिर हुआ....

राजा ने पुछा
यह सब क्या है....?

व्यापारी ने कहा......
यह नीम है.....
इसके पत्ते कडक परंतु औषधीय है...
इसके फल पकने पर मिठे व औषधीय है
इसके काष्ठ,छाले,जड़ भी औषधीय है...
इसके पुष्प को भी आप चाहे तो तरकारी तथा साग बनाकर खा सकते है....
यह वृक्ष छाया  प्रदानकारी भी  है ....

हे राजन ! मेरे देशमें
इस वृक्ष के काष्ठ से निर्मित भगवान पूजें जाते है...

हे राजन !!! यह सभी वृक्ष में श्रेष्ठ मानाजाता है...
आपके देशमें
इस वृक्ष को लगाइये
सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा....

राजा खुस हुआ
उसने उस वृक्ष को समस्त
पूर्वभारतीय द्वीपों मे लगाने का आदेश जारी कियाओर व्यापारी को ससम्मान धनधान्य देकर बिदा किया.....।

रविवार, 10 सितंबर 2017

आमिष~निरामिष

अम धातु+ करण+इष प्रत्यय =आमिष
यह ननभेज्  को संस्कृत तथा ओडिआ मे आमिष कहते है

अम धातु का अर्थ है रुग्ण होना....
जिन खाद्यों को खाने से व्यक्ति रोगी हो जाए वे सब आमिष है ....
जाहिर तौर पर हमारे पूर्वज जानते थे कि मांस मछलीओं में कई तरह के विषाणु मौजूद है
ओर उन्होंने उसका ऐसा नाम दिया
बादमें महिलाओं ने खाद्य पकाने कि विधी तथा अग्नी का आविष्कार किया होगा ओर तब लोगों के दिमागमें मांस को पकाने का ख्याल आया होगा...

लोगों ने मांस को पकाकर खाया ओर उन्होंने देखा कि यह कुछ हदतक सुरक्षित है
फिर उन्होंने उसमें हलदी से दालचीनी तक तरह तरह के  मेडिसिनल द्रव्य मिलाएं ओर आज
हम भारतीय सबसे शुद्ध सुरक्षित पकवान खाते है ।

लेकिन वाहर के देशों में भारतीयों कि भांति देर तक मांस नहीं पकाया जाता
न हीं हमारे जितना मसाला डाला जाता है
उसपर भी ऐसे जीवों को ऐसे देशों में खाया जाता है जो कि भारतीय खाते नहीं
मसलन स्वाइन फ्लू बार्ड फ्लू जैसे बिमारियों का फैलना

ओर
आमिष का विपरीत निरामिष है ..
व्याकरण के हिसाब से जो रोग उत्पन्न करे वो आमिष है......
लेकिन.....
यहाँ
निर्+आमिष =निरामिष बना है .....
यहां निर् प्रत्यय अभाव अर्थ में प्रयुक्त हुआ है....

अर्थात्
जिसमें आमिष नहीं वो निरामिष ...।
वाकी भावुक लोग अपने अपने हिसाब से व्याख्या करते रहते है.......

अब देखा गया है हमारे देश में लोग कुछ ज्यादे ही सेन्सिटिव है....

वो किसी पर भी धार्मिक बंदूक तानकै कहदेते
कि मांस मछली खानेवाले म्लेच्छ है.....
खाते तो ये भी किसी न किसी जीव को ही है लेकिन दोश दूसरों के सर मढने में हमारे देश के लोगों को बडा़ मजा आता है....

लोग कहते है आप जीवहत्या करते हो वो राजसी है या तामसी है सात्विक नहीं
लेकिन यदि
इस हिसाब से देखा जाय तो क्या मानव बीजों को पकाकर उनमें निहित जीवित प्राणी को उसके जन्म से पहले ही नहीं मारा करते ?

यदि संसार में सात्विक भाव ढुंडोगे वो भी आंखे खुले रखकर तो सिबाए मिट्टी ,हवा व जल के कुछ भी न मिलेगा.. .

ओर तो ओर मिट्टी हवा तथा जल में भी शुक्ष्म जीव मौजूद होते है
अतः वैज्ञानिक आधार पर तो इस संसार में सभी एक दुसरेको मारकर काटकर खाके जिंदा है....

असलियत तो यही है कि
कुछ लोग जीवों को खाते है
ओर कुछ बीजों को
हत्या दोनों ओर होता है.......

इसपर कुछ लोग मुंह फुलाए कहेंगे
“बीज़ो ( अन्न ) को खाने से किसी जीव की अकारण हत्या करने का तमस् भाव हृदय में पैदा नहीं होता !
अन्नाहारी के आँगन में फल-फूलों के बाग मिलेंगे ; और माँसाहारी के आँगन में मुर्गों के तबेले !”
😂😂
लेकिन यदि विज्ञान के हिसाब से देखें तो
हृदय में केवल ब्लड शुद्ध होता है 😂

मानव जो क्रिया करता है सब उसके मस्तिष्क के वजह से ....

ओर यदि धर्म ग्रंथमें बीज हत्या पर भी
लोगों को डराने के लिए कुछ लिखागया होता

तो लोगों के मन में संशय ज्ञान उत्पन्न होता
ओर ये संशय ज्ञान बडा़ जहरीला है

इसपर एक काहानी याद आ रहा है.....
एकबार एक अमेरिकी कैदीके साथ एक परिक्षण किया गया....
उसे पहले एक जहरीले साप के बारे में जानकारी दियागया फिर एक व्यक्ति उसके सामने उसी नस्ल का एक सांप लेकर आया.....
उसे बताया गया कि
इसी साप के द्वारा उसे कटवाया जाएगा....
फिर उसके
आखों में पट्टी बांधकर उसे
बिठाया गया
ओर उसे एक अन्य बिनजहरीले साप से कटवाया गया....

व्यक्ति मरगया.....
उसके अंगों में जहर फैल गया था
लेकिन ये जहर उस सांप कि नहीं थी....
उस कैदी के मस्तिष्क ने वह जहर बनाया था....
वो भी सिर्फ डर के कारण.....

तो
प्यारे पाठक
आपका मस्तिष्क ही आपका मित्र है ओर शत्रु भी.....

इसलिए बिना सोचे खाते जाओ
ओर उस खाद्य में शुद्ध अशुभ
आमिष निरामिष न देखना बंधु वरना आपका मस्तिष्क आपकी खाने खाते समय ही उलटी करवा देगा....
😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂

शनिवार, 9 सितंबर 2017

●●●●●अयं कः●●●●

एक अनपढ़ ब्राह्मण पाण्डाजी  थे वो एक दिन मिश्रा जी के यहां गये हुए थे
तभी वहां एक विद्वान पंडित रामेश्वर भारती आये ओर आकर मिश्रा जी से संस्कृत में बतियाने लगे ....
उन्होंने पांडाजीकि ओर उंगली दिखाते हुए मिश्रा जी से पुछा “अयं कः(ये कौन)
मिश्रा जी ने उनको बता दिया
फिर
जब कार्य खत्म हो जानेपर  रामेश्वर भारती जाने लगे पांडाजीने मिश्राजी से पुछा
का हो ! का वोलत रहे भैया ऊ....
“अयं कः” ?
आखिर कार ई अयं कः का क्या मतलब है ?

मिश्रा जी चिढते हुए बोले
बोल दिया सो बोल दिया
अब पुछने से मतलब ?

लेकिन पांडाजी जिद करने लगे सो मिश्रा जी ने
गम्भीर चेहरा बनाते हुए कहा....
ओहो !!!! कित्ता बडा़ गाली दे गये वो....
पता है आपको....?
कैसे पता होगा बोलो
बचपन में पढाई किए नहीं अब का खाक् समझेंगे
चलो जो हुआ सो हुआ
अब बडे आदमी ने बोल ही दिया है तो का कर सकते है भैया ?

पांडाजी के सफेद  आंख तुरंत लाल हो गये
गुस्से में स्वयं पर्शुराम समान रुप धर कर मिश्रा जी को कहने लगे

“मिश्राजी उ पंडित होगा उकरे घर मां' हमें गारी काहे दे रहा था ?”

ओर इत्ता कहके
पांडाजी
रामेश्वर भारती के पिछे दौडते हुए उन्हे कहने लगे

ओ पंडित
तुम अयं कः,तुम्हारा वाप अयं कः ,तुम्हारे सात पुस्ते अयं कः 😜😂🤣🤣🤣